वीरेन का जाना, जीवंत वामपंथी प्रतिज्ञा को गहरा आघात

वीरेन डांगवाल - न्यूज़ अपडेट 29 सेप्टेंबर 2015“अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी साम्राज्यवाद और राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी-मार्का हिंदुत्ववादी फासीवाद के मौजूदा वर्चस्व के दौर में वीरेन डंगवाल (1948-2015) की कविता किसी आत्मीय, जीवंत, वामपंथी प्रतिज्ञा की तरह सामने आती है। ”

इसमें एक निर्दोष, मारक, जिद-सी भी दिखाई देती है – कि हम इस साम्राज्यवाद और फासिस्ट निजाम की ऐसी-की-तैसी करेंगे। आप चाहें तो वीरेन डंगवाल की कविता को जनवादी कविता कह सकते हैं — हिंदी की उत्कृष्ट, श्रेष्ठ जनवादी कविता,  जिसमें किसी समस्या का तुरत-फुरत समाधान, चलताऊ सदाशयता व ऊबाऊ प्रवचन नहीं है,  बल्कि जो गंभीर, सरस, दोस्ताना, कलाकर्म से भरी हुई है। ऐसा जिम्मेदार कलाकर्म, जो पाठक-श्रोता के अंदर आंतक नहीं पैदा करता, उससे दूरी नहीं बनाता, बल्कि उसे अपने साथ लिए चलता है। वीरेन की कविता में कथ्य व काव्यरूप की विलक्षण विविधता और प्रयोगधर्मिता दिखाई देती है, और हमारे सामने कविता का भरा-पूरा, सुंदर वितान खींच जाता है। ओर पढ़े

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